उत्तराखंड में वन विभाग में ACF/SDO और रेंजर स्तर के अधिकारियों के तबादलों को लेकर जटिल स्थिति बनी हुई है। इसका मुख्य कारण वार्षिक स्थानांतरण अधिनियम 2017 है, जिसके तहत इन अधिकारियों के तबादलों की प्रक्रिया में कई प्रशासनिक बाध्यताएं लागू होती हैं।
अधिनियम की वर्तमान सूची में कुछ सेवाओं को दायरे से बाहर रखा गया है, जिनमें अखिल भारतीय सेवा, राज्य सिविल सेवा और राज्य पुलिस सेवा शामिल हैं। हालांकि, राज्य वन सेवा को इस सूची में शामिल नहीं किया गया है। इसका असर यह हुआ कि ACF/SDO और रेंजर अधिकारियों के तबादले अधिनियम के नियमों के अनुसार करने पड़ रहे हैं, जिससे विभाग को प्रशासनिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
वन विभाग का तर्क है कि उनकी कार्यप्रणाली अन्य प्रशासनिक विभागों से भिन्न है। जंगलों के संरक्षण, वन्यजीव प्रबंधन, वन अपराध रोकथाम और फील्ड स्तर की व्यवस्थाओं के चलते अधिकारियों के तत्काल तबादले अक्सर आवश्यक होते हैं। यदि इन तबादलों पर अधिनियम की सख्त बाध्यताएं लागू रहेंगी, तो विभाग की कार्यकुशलता प्रभावित हो सकती है।
इस स्थिति को देखते हुए, वन विभाग ने अधिनियम में संशोधन की मांग उठाई है। विभाग चाहता है कि धारा 1(3) में बदलाव करके राज्य वन सेवा को भी उन सेवाओं की सूची में शामिल किया जाए जिन्हें अधिनियम से छूट दी गई है। इससे विभाग को अधिकारियों के तबादले विभागीय जरूरतों के अनुसार आसानी से करने में सुविधा होगी।
जानकारी के अनुसार, प्रमुख वन संरक्षक (HOOF) ने प्रमुख सचिव वन को प्रस्ताव भेजा है और कार्मिक विभाग को पत्र लिखकर अधिनियम में संशोधन का अनुरोध किया है। विभाग का कहना है कि राज्य वन सेवा की प्रकृति को देखते हुए इसे भी राज्य सिविल सेवा और पुलिस सेवा जैसी विशेष छूट मिलनी चाहिए।
यदि यह संशोधन लागू होता है, तो वन विभाग को अधिकारियों के तबादले करने में अधिक प्रशासनिक स्वतंत्रता मिलेगी और विभाग की कार्यकुशलता बढ़ेगी। फिलहाल विभाग इस मामले में शासन स्तर पर सकारात्मक निर्णय की उम्मीद कर रहा है।


