डिजिटल दुनिया में बच्चों की सुरक्षा को लेकर चल रही बहस के बीच केंद्र सरकार ने अपना रुख साफ कर दिया है। सरकार बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं है। इसके बजाय 18 साल से कम उम्र के किशोरों के लिए उम्र के आधार पर अलग-अलग नियम बनाने पर विचार किया जा रहा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार केंद्र सरकार इस विषय पर नया कानून लाने की तैयारी कर रही है, जिसे संसद के आगामी मानसून सत्र में पेश किया जा सकता है। सरकार ‘ग्रेडेड’ यानी चरणबद्ध व्यवस्था पर काम कर रही है, जिसमें बच्चों की उम्र के हिसाब से सोशल मीडिया के उपयोग पर अलग-अलग पाबंदियां तय की जाएंगी।
प्रस्तावित नियमों के तहत बच्चों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है। इसमें 8 से 12 वर्ष तक के बच्चों के लिए सबसे सख्त नियम लागू हो सकते हैं। 12 से 16 वर्ष के किशोरों के लिए मध्यम स्तर की निगरानी और सीमाएं तय की जाएंगी, जबकि 16 से 18 वर्ष के युवाओं को कुछ अधिक स्वतंत्रता दी जा सकती है, लेकिन उनके लिए भी सुरक्षा मानक लागू रहेंगे।
सरकार का मानना है कि आज की पीढ़ी पहले की तुलना में ज्यादा जागरूक और तकनीक से परिचित है। इसलिए पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के बजाय संतुलित और व्यावहारिक नियम बनाना अधिक प्रभावी होगा।
सूत्रों के मुताबिक आईटी मंत्रालय में चल रही चर्चाओं में सोशल मीडिया के उपयोग के लिए समय सीमा तय करने का प्रस्ताव प्रमुखता से सामने आया है। इसमें बच्चों के लिए दिन में सीमित समय तक सोशल मीडिया उपयोग की अनुमति देने, देर शाम या रात में लॉग-इन पर रोक लगाने और किसी भी प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल के लिए माता-पिता की अनिवार्य सहमति को तकनीकी रूप से जोड़ने जैसे प्रावधानों पर विचार किया जा रहा है।
यह मॉडल चीन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के हालिया कदमों से प्रेरित माना जा रहा है, जहां ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया के उपयोग पर समय आधारित प्रतिबंध लागू किए गए हैं।
हालांकि इस मुद्दे पर राज्यों के अलग-अलग प्रस्ताव भी सामने आए हैं। आंध्र प्रदेश ने 13 वर्ष से कम और कर्नाटक ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध का सुझाव दिया है। सोशल मीडिया कंपनियों का कहना है कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नियम लागू करना तकनीकी रूप से कठिन होगा। इसी वजह से केंद्र सरकार पूरे देश के लिए एक समान कानून बनाने की दिशा में काम कर रही है।
डिजिटल एडिक्शन और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती चिंताओं के चलते इस तरह के नियमों की आवश्यकता महसूस की जा रही है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में भी बच्चों के लिए उम्र आधारित सीमाएं तय करने और उन्हें लक्षित विज्ञापनों से दूर रखने की सिफारिश की गई थी।
हालांकि इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन जैसे संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर नियम बहुत सख्त हुए तो इससे डिजिटल जेंडर गैप बढ़ सकता है। उनका कहना है कि भारत जैसे समाज में सुरक्षा के नाम पर लगाए गए प्रतिबंध कई बार लड़कियों की इंटरनेट तक पहुंच को सीमित करने का कारण बन सकते हैं।


