उत्तराखंड सरकार ने निर्माण कार्यों की निविदा प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, प्रतिस्पर्धी और व्यावहारिक बनाने के उद्देश्य से ई-प्रोक्योरमेंट व्यवस्था के तहत महत्वपूर्ण संशोधन किए हैं। वित्त विभाग द्वारा जारी नए दिशा-निर्देशों के अनुसार अब 25 लाख रुपये तक के निर्माण कार्यों में ई-टेंडरिंग अनिवार्य नहीं होगी और इस श्रेणी में पूर्व की व्यवस्था ही लागू रहेगी।
नई व्यवस्था के तहत 25 लाख से 1.50 करोड़ रुपये तक के निर्माण कार्य ई-टेंडरिंग के माध्यम से सिंगल स्टेज सिंगल एनवेलप प्रणाली से कराए जाएंगे। इसमें तकनीकी और वित्तीय प्रस्ताव एक साथ आमंत्रित किए जाएंगे और निविदा से संबंधित सभी आवश्यक दस्तावेज ई-टेंडर पोर्टल पर स्कैन कॉपी के रूप में अपलोड करना अनिवार्य होगा।
वहीं, 1.50 करोड़ से 10 करोड़ रुपये तक के निर्माण कार्यों के लिए निविदा शर्तों को और सख्त किया गया है। इसमें पिछले पांच वर्षों का कार्य अनुभव, औसत वार्षिक निर्माण टर्नओवर तथा प्रमुख मदों में न्यूनतम 50 प्रतिशत पीक एनुअल रेट ऑफ कंस्ट्रक्शन की शर्त तय की गई है। हालांकि, तकनीकी निविदा में तकनीकी स्टाफ, प्लांट-मशीनरी और फोटोग्राफ जैसी जानकारियां देना अनिवार्य नहीं होगा।
10 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाले निर्माण कार्यों के लिए ठेकेदारों को औसत वार्षिक निर्माण टर्नओवर प्रस्तावित कार्य की अनुमानित लागत के बराबर यानी 100 प्रतिशत प्रमाणित करना होगा। साथ ही, बीते पांच वर्षों में न्यूनतम 50 प्रतिशत लागत का एक कार्य या 33 प्रतिशत लागत के दो कार्य पूर्ण करने का अनुभव भी अनिवार्य किया गया है।
संयुक्त उपक्रम (ज्वाइंट वेंचर) के माध्यम से निविदा में भाग लेने वाली फर्मों के लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए गए हैं। इसमें लीड पार्टनर की भूमिका, ईएमडी जमा करने की जिम्मेदारी और अनुभव की गणना से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। ज्वाइंट वेंचर के रूप में प्रमाणित कार्य अनुभव के लिए अलग से अनुभव प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं होगी।
वित्त विभाग का कहना है कि इन संशोधनों से निविदा प्रक्रिया अधिक सरल और व्यावहारिक होगी, जिससे छोटे और मध्यम ठेकेदारों को राहत मिलेगी। साथ ही निर्माण कार्यों में समयबद्धता और गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सकेगी। यह शासनादेश जारी होने की तिथि से प्रभावी रहेगा और आवश्यकता पड़ने पर इसमें आगे भी संशोधन किया जा सकता है।


