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कम बारिश, टूटता संतुलन और बढ़ती महंगाई… देश पर बड़ा मौसमीय संकट तैयार?

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देश में इस साल मौसम की बेरुखी खेती-किसानी, जल संकट और आम लोगों की जेब पर भारी पड़ सकती है। मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि तेजी से विकसित हो रही अल नीनो (El Niño) की स्थिति भारत के मानसून को कमजोर कर सकती है, जिससे 2026 में पिछले एक दशक का सबसे कमजोर मानसून देखने को मिल सकता है।

मौसम संबंधी अध्ययनों के अनुसार, इस वर्ष सूखे या सामान्य से काफी कम बारिश की संभावना बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अल नीनो प्रभाव मजबूत हुआ तो इसका असर केवल बारिश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कृषि उत्पादन, जल भंडारण और खाद्य कीमतों पर भी पड़ेगा।

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मौसम विभाग के अनुमान बताते हैं कि दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान देश में सामान्य औसत से कम वर्षा हो सकती है। वहीं अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसियों ने भी अल नीनो के सक्रिय होने की संभावना जताई है, जो आने वाले महीनों में और मजबूत हो सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि कुल बारिश से ज्यादा चिंता उसके असमान वितरण को लेकर है। कई क्षेत्रों में लंबे समय तक बारिश न होने और बीच-बीच में ‘ब्रेक मानसून’ जैसी स्थिति बनने की आशंका है। इससे खेती पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और उत्तर-पश्चिम भारत में भीषण उमस भरी गर्मी का दौर देखने को मिल सकता है।

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भारत की आधे से अधिक कृषि भूमि आज भी बारिश पर निर्भर है। ऐसे में कमजोर मानसून से फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है। कम वर्षा होने पर भूजल स्तर, जलाशयों का जल भंडार और सिंचाई व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ेगा, जिसका असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और बिजली उत्पादन तक दिखाई दे सकता है।

विशेषज्ञों ने चेताया है कि कम बारिश, बढ़ती गर्मी और वैश्विक स्तर पर ईंधन व उर्वरकों की महंगाई मिलकर देश के लिए एक बड़ा आर्थिक और पर्यावरणीय संकट खड़ा कर सकती है। हालांकि हिंद महासागर में बनने वाली कुछ अनुकूल मौसमी परिस्थितियां सूखे के प्रभाव को आंशिक रूप से कम कर सकती हैं, लेकिन वे अल नीनो के असर को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाएंगी।

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वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2026 दुनिया के सबसे गर्म वर्षों में शामिल हो सकता है, जबकि 2027 अब तक के रिकॉर्ड गर्म वर्षों को भी पीछे छोड़ सकता है। ऐसे में आने वाले दो साल मौसम और जलवायु के लिहाज से बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं।

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हिल दर्पण डेस्क

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