उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य न्यायिक सेवा में बड़े पैमाने पर फेरबदल करते हुए कई अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीशों तथा सिविल जजों के स्थानांतरण और नई तैनातियों के आदेश जारी किए हैं। रजिस्ट्रार जनरल योगेश कुमार गुप्ता द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, आम जनता को सुलभ और त्वरित न्याय उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विभिन्न जिलों में विशेष पॉक्सो अदालतों में न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति की गई है, वहीं दूरदराज और पर्वतीय क्षेत्रों में नियमित कैंप कोर्ट आयोजित करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
अधिसूचना के तहत द्वितीय अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश काशीपुर रितेश कुमार श्रीवास्तव को काशीपुर में ही फास्ट ट्रैक विशेष पॉक्सो अदालत का दायित्व सौंपा गया है। परिवार न्यायालय टिहरी के न्यायाधीश अब्दुल कय्यूम को विकासनगर स्थित विशेष पॉक्सो अदालत में स्थानांतरित किया गया है। वहीं, टिहरी की स्थायी लोक अदालत की अध्यक्ष कुसुम को देहरादून और नैनीताल की स्थायी लोक अदालत के अध्यक्ष सुधीर तोमर को नैनीताल में विशेष पॉक्सो अदालत के रिक्त पदों पर तैनात किया गया है।
सिविल जज (जूनियर डिवीजन) स्तर पर भी कई बदलाव किए गए हैं। शंभू नाथ सिंह सेथवाल को उधम सिंह नगर से देहरादून भेजा गया है, जबकि अनिल कुमार कोरी का स्थानांतरण जोशीमठ से द्वारहाट किया गया है। इसके अलावा प्रतीक मथेला, अनुराग त्रिपाठी, प्रतीक्षा केसरवानी, ईशांक, नवीन राणा, परमिंदर कौर, नेहा, धनिष्ठा आर्या और ज्योति सिंह को विभिन्न जिलों में नई जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं।
न्यायालय ने पर्वतीय और दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों को न्यायिक सुविधाएं उनके नजदीक उपलब्ध कराने के लिए कई स्थानों पर नियमित कैंप कोर्ट लगाने के निर्देश भी जारी किए हैं। इसके तहत लैंसडाउन के सिविल जज धुमाकोट, कोटद्वार के सिविल जज सतपुली, चमोली के सिविल जज ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) और टिहरी के सिविल जज प्रतापनगर में निर्धारित अवधि के लिए हर माह कैंप कोर्ट आयोजित करेंगे।
इसके अलावा उत्तराखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को टिहरी और नैनीताल के जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को स्थायी लोक अदालत के अध्यक्ष पद का अतिरिक्त कार्यभार देने की सिफारिश की गई है। वहीं, अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश टिहरी नसीम अहमद को सप्ताह में दो दिन परिवार न्यायालय के न्यायाधीश का अतिरिक्त प्रभार सौंपने का प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा गया है। उच्च न्यायालय के इस व्यापक फेरबदल को न्यायिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी, सुगम और जनसुलभ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।


