उत्तराखंड को लेकर हुए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में भविष्य के भूकंप के खतरे को लेकर अहम जानकारी सामने आई है। शोध के मुताबिक, राज्य के नीचे मौजूद मेन हिमालयन थ्रस्ट (एमएचटी) में लगातार भूगर्भीय तनाव जमा हो रहा है, जिससे आने वाले समय में मध्यम से बड़े भूकंप की आशंका बनी हुई है। यह अध्ययन जर्नल ऑफ एशियन अर्थ साइंसेस में प्रकाशित हुआ है।
सीएसआईआर-नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनजीआरआई) के वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड के नीचे पृथ्वी की करीब 180 किलोमीटर गहराई तक की संरचना का अध्ययन किया। इसके लिए वर्ष 2017 से स्थापित 76 ब्रॉडबैंड भूकंप मापन केंद्रों से मिले हजारों भूकंपीय संकेतों और करीब 700 दूरस्थ भूकंपों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।
अध्ययन में पाया गया कि 8 से 20 किलोमीटर की गहराई पर ऐसा क्षेत्र मौजूद है, जहां भूकंपीय तरंगों की गति सामान्य से कम है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस क्षेत्र में पानी और अन्य द्रव मौजूद होने के कारण चट्टानें कमजोर हो रही हैं। इससे फॉल्ट लाइन पर फिसलन बढ़ सकती है और भूगर्भीय तनाव लंबे समय तक जमा रहने के बाद बड़े भूकंप का कारण बन सकता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, उत्तराखंड सेंट्रल हिमालयन सिस्मिक गैप का हिस्सा है। यह वह इलाका है, जहां लंबे समय से कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है, लेकिन जमीन के भीतर लगातार तनाव बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस अध्ययन से भविष्य में भूकंप के जोखिम को बेहतर तरीके से समझने और आपदा प्रबंधन की तैयारियों को मजबूत करने में मदद मिलेगी।
मेन हिमालयन थ्रस्ट हिमालय के नीचे स्थित वह प्रमुख भूगर्भीय फॉल्ट है, जहां भारतीय प्लेट लगातार यूरेशियन प्लेट के नीचे खिसक रही है। इसी प्रक्रिया के दौरान चट्टानों में दबाव जमा होता रहता है और जब यह दबाव अचानक मुक्त होता है तो भूकंप आता है। उत्तराखंड में वर्ष 1803 का गढ़वाल, 1991 का उत्तरकाशी और 1999 का चमोली भूकंप इसी भूगर्भीय प्रणाली से जुड़े माने जाते हैं।


