उत्तराखंड में कोविड-19 महामारी के दौरान मुख्यमंत्री राहत कोष से जारी किए गए करोड़ों रुपये के खर्च का हिसाब अब तक अधूरा पड़ा है। मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) लगातार विभिन्न विभागों को पत्र भेजकर उपयोगिता प्रमाण पत्र (यूसी) जमा करने की याद दिला रहा है, लेकिन कई विभागों की ओर से अभी भी पूरी रिपोर्ट नहीं सौंपी गई है।
यह मामला उस समय से जुड़ा है जब महामारी के दौरान आपात स्थिति में फंसे लोगों की मदद, परिवहन व्यवस्था, वैक्सीनेशन अभियान और अस्थायी कोविड अस्पतालों के संचालन के लिए बड़े पैमाने पर धनराशि जारी की गई थी। लेकिन पांच साल बीत जाने के बाद भी इन खर्चों का अंतिम लेखा-जोखा शासन के रिकॉर्ड में पूरा नहीं हो सका है।
सबसे अधिक देरी परिवहन विभाग से जुड़ी बताई जा रही है। लॉकडाउन के दौरान यात्रियों और तीर्थयात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने के लिए लगभग 24 करोड़ रुपये जारी किए गए थे, लेकिन इस राशि का उपयोगिता प्रमाण पत्र अब तक जमा नहीं किया गया है।
स्वास्थ्य विभाग के मामले में भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। कोविड काल में मुफ्त वैक्सीनेशन और अस्थायी अस्पतालों के संचालन के लिए करीब 130 करोड़ रुपये जारी किए गए थे। इसमें से कुछ राशि का हिसाब मिल चुका है, लेकिन लगभग 50 करोड़ रुपये के खर्च का यूसी अभी भी लंबित है।
इसके अलावा न्याय विभाग को भी अधिवक्ताओं की सहायता के लिए 60 लाख रुपये दिए गए थे, लेकिन इस मद में भी उपयोगिता प्रमाण पत्र अब तक शासन को नहीं मिला है। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से कई बार पत्राचार किए जाने के बावजूद विभागों द्वारा समय पर जवाब न देने से राहत कोष के ऑडिट और वित्तीय मिलान की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
वित्तीय नियमों के अनुसार किसी भी विभाग को जारी धनराशि का उपयोग प्रमाणित करने के लिए यूसी जमा करना अनिवार्य होता है। इसके बिना यह सुनिश्चित नहीं हो पाता कि सरकारी धन का उपयोग तय उद्देश्य के लिए ही हुआ है या नहीं।
अब सवाल यह उठ रहा है कि वर्षों बीत जाने के बावजूद विभागों ने इस मामले को गंभीरता से क्यों नहीं लिया और क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई ठोस कार्रवाई की गई है या नहीं। पूरा मामला प्रशासनिक जवाबदेही और वित्तीय अनुशासन पर सवाल खड़ा करता है, जहां करोड़ों रुपये के सार्वजनिक धन का पूरा हिसाब आज भी अधूरा है।


