उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कोरोनाकाल के दौरान महिला से दुर्व्यवहार के आरोपी कांस्टेबल की बर्खास्तगी को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि बिना विभागीय जांच और सुनवाई का अवसर दिए किसी कर्मचारी को सेवा से हटाना कानूनन सही नहीं है।
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता जगदीशनाथ को 2012 में उत्तराखंड पुलिस में कांस्टेबल के पद पर नियुक्त किया गया था। 24 मई 2020 को उधम सिंह नगर के एसएसपी ने उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया था। उन पर आरोप था कि लॉकडाउन के दौरान पुलभट्टा (किच्छा) स्थित क्वारंटाइन सेंटर में ड्यूटी के समय उन्होंने एक महिला के साथ दुर्व्यवहार किया और वह शराब के नशे में थे।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट में दलील दी कि घटना और बर्खास्तगी का आदेश एक ही दिन जारी कर दिया गया, बिना किसी विभागीय जांच और बिना उनका पक्ष सुने। इसे संविधान के अनुच्छेद 311(1) और सेवा नियमों का उल्लंघन बताया गया।
राज्य की ओर से कहा गया कि कार्रवाई सर्किल अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर की गई थी, लेकिन कोर्ट ने पाया कि उक्त अधिकारी को विधिवत जांच अधिकारी नियुक्त नहीं किया गया था। अदालत ने कहा कि विभागीय जांच से छूट केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दी जा सकती है, जबकि इस मामले में ऐसा कोई ठोस कारण नहीं था।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम तुलसी राम पटेल (1985)’ फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जांच से छूट देने के लिए ठोस और स्पष्ट कारण जरूरी हैं।
न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की पीठ ने बर्खास्तगी और अपील दोनों आदेशों को निरस्त करते हुए कांस्टेबल को सेवा में बहाल करने के निर्देश दिए। साथ ही, बकाया वेतन का 50 प्रतिशत भुगतान करने का आदेश भी दिया गया। हालांकि, कोर्ट ने विभाग को नियमों के तहत तीन महीने के भीतर दोबारा विभागीय जांच शुरू करने की अनुमति दी है। इस फैसले को कांस्टेबल के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।


