सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को हल्द्वानी के वनभूलपुरा क्षेत्र में रेलवे भूमि पर वर्षों से रह रहे हजारों परिवारों से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि रेलवे की विस्तार और विकास परियोजनाओं के मद्देनजर सार्वजनिक भूमि खाली कराई जा सकती है और इस पर कब्जा जमाए लोग यह तय नहीं कर सकते कि रेलवे अपनी जमीन का उपयोग कैसे करे।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि सार्वजनिक जमीन पर अवैध कब्जा करने वाले यह निर्देश नहीं दे सकते कि राज्य अपनी संपत्ति का उपयोग किस प्रकार करे। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि रेलवे लाइनों के बेहद पास रहना लोगों की सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक है, इसलिए बेहतर होगा कि उन्हें सुरक्षित स्थान पर बसाया जाए।
पीठ में शामिल जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि इसमें कोई विवाद नहीं है कि भूमि राज्य की है और उसका उपयोग कैसे किया जाए, यह राज्य का विशेषाधिकार है। हालांकि, जो लोग लंबे समय से वहां रह रहे हैं, उन्हें हटाते समय मानवीय दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। अदालत ने कहा कि प्रभावित लोग जमीन पर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकते, लेकिन वे पुनर्वास की मांग जरूर कर सकते हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत उन्हें ‘अतिक्रमणकारी’ कहने के बजाय ‘कब्जाधारी’ के रूप में देख रही है, क्योंकि सरकार पुनर्वास की प्रक्रिया पर विचार कर रही है। उन्होंने कहा कि विस्थापन के प्रभाव को कम करने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पात्रता तय करना आवश्यक है।
अदालत ने कहा कि इस मामले में संतुलित और लचीला दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है, ताकि एक ओर राज्य की विकास परियोजनाएं प्रभावित न हों और दूसरी ओर हजारों परिवारों का पुनर्वास भी सुनिश्चित किया जा सके। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह हजारों जिंदगियों का सवाल है और बच्चों की शिक्षा, पेयजल, आवास जैसी बुनियादी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए समाधान निकाला जाना चाहिए।
इससे पहले प्रभावित परिवारों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद और अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया था कि इलाके में करीब 5,000 परिवार कई वर्षों से रह रहे हैं और वहां स्कूल व अन्य सार्वजनिक संस्थान भी संचालित हैं।
यह आदेश दिसंबर 2022 में उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा दिए गए निर्देश के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनाया गया। हाईकोर्ट ने हल्द्वानी में सार्वजनिक भूमि पर बसे परिवारों को हटाने का आदेश दिया था। जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश पर रोक लगा दी थी, जो अब तक प्रभावी थी।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार के साथ रेलवे को पुनर्वास योजना पेश करने के निर्देश दिए थे। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि प्रभावित लोगों का पुनर्वास प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत किया जा सकता है और रेलवे की विकास परियोजनाओं के लिए भूमि आवश्यक है।
अदालत के इस फैसले को विकास और मानवीय संवेदनशीलता के बीच संतुलन साधने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।


