हल्द्वानी के बनभूलपुरा हिंसा मामले में आरोपी अब्दुल मलिक को मिली जमानत के खिलाफ उत्तराखंड सरकार की याचिका पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले में यूएपीए लगाए जाने को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा में अंतर है। कोर्ट ने हाई कोर्ट के जमानत आदेश में हस्तक्षेप करने से भी इनकार कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि अब्दुल मलिक इस मामले का मुख्य साजिशकर्ता है। इसलिए घटना के दौरान उसकी मौके पर शारीरिक मौजूदगी नहीं होने का कोई महत्व नहीं है। राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि हिंसा के दौरान पुलिस स्टेशन पर हमला किया गया, आगजनी हुई और पेट्रोल बम तक फेंके गए।
राज्य सरकार के वकील ने यूएपीए की धारा 43डी (5) के तहत जमानत की सख्त शर्तों का हवाला देते हुए हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी। इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यूएपीए के आरोपों को लेकर सवाल उठाया। न्यायमूर्ति बागची ने पूछा कि अगर कोई भीड़ पुलिस स्टेशन जाकर उसे जला देती है तो क्या ऐसी घटना पर अपने आप यूएपीए लागू हो जाएगा? राज्य की ओर से जवाब दिया गया कि यदि सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा पैदा होता है तो यूएपीए लगाया जा सकता है।
इस पर पीठ ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा अलग-अलग विषय हैं। कोर्ट ने यूएपीए लगाए जाने पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि उसे हाई कोर्ट के आदेश में दखल देने का कोई आधार नहीं दिख रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लंबे समय से चल रही हिरासत को भी महत्वपूर्ण माना। पीठ ने कहा कि अब्दुल मलिक करीब दो साल से हिरासत में है। कोर्ट ने ट्रायल की धीमी गति पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यदि आरोप इतने गंभीर हैं, जितना राज्य सरकार दावा कर रही है, तो अब तक मुकदमे में आगे की स्थिति सामने आ जानी चाहिए थी।
राज्य सरकार की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि पुलिस स्टेशन पर हमले के मामले में संभावित आजीवन कारावास जैसे गंभीर आरोप हैं और करीब दो साल की हिरासत जमानत पर विचार के लिए प्रासंगिक नहीं होनी चाहिए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट इससे सहमत नहीं हुआ।
पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट के आदेश में दखल देने के लिए अलग से विस्तृत स्पीकिंग ऑर्डर की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि जमानत देने के पीछे गलत कारण भी रहे हों, तब भी मौजूदा परिस्थितियों में हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप का आधार नहीं बनता।
बता दें कि अप्रैल में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने अब्दुल मलिक को जमानत दी थी। मलिक पर 8 फरवरी 2024 को हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में हुई हिंसा के संबंध में आईपीसी, यूएपीए, आर्म्स एक्ट समेत विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमे दर्ज हैं। राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के इसी जमानत आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।


