देश के कई अहम राज्यों में कांग्रेस के भीतर बढ़ती गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर उठते सवालों ने पार्टी की चुनौतियां बढ़ा दी हैं। लंबे समय से राजनीतिक जमीन बचाने की कोशिश कर रही पार्टी को अब अंदरूनी असंतोष और सहयोगी दलों के साथ तनाव का सामना करना पड़ रहा है। केरल, असम, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में हालिया घटनाक्रम ने केंद्रीय नेतृत्व की चिंता और बढ़ा दी है।
केरल में वरिष्ठ नेता मानी शंकर ऐयार के बयान से पार्टी असहज हो गई। अय्यर ने कहा कि मुख्यमंत्री Pinarayi Vijayan के नेतृत्व वाली लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) सरकार लगातार तीसरी बार सत्ता में लौट सकती है। हालांकि उन्होंने एक कांग्रेसी के रूप में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) की जीत की इच्छा जताई, लेकिन अपने बयान पर कायम रहे। केरल में परंपरागत रूप से UDF और LDF के बीच हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन होता रहा है, जिसे 2021 में विजयन ने तोड़ दिया था। ऐसे में अय्यर की टिप्पणी को कांग्रेस की वापसी की रणनीति के लिए झटका माना जा रहा है।
असम में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेंद्र कुमार बोरह के इस्तीफे और फिर वापसी ने पार्टी की आंतरिक खींचतान उजागर कर दी। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को इस्तीफा भेजते हुए उपेक्षा का आरोप लगाया था। बाद में राहुल गाँधी और केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप से मामला शांत हुआ। राज्य में भाजपा के मजबूत नेता हिमानता बिस्वा शर्मा के सामने कांग्रेस पहले ही संघर्ष कर रही है, ऐसे में अंदरूनी असंतोष ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।
तमिलनाडु में कांग्रेस की चिंता उसके सहयोगी द्रविदा मुन्नेत्र कज़हगाम (DMK) के साथ संबंधों को लेकर है। मुख्यमंत्री M. K. Stalin ने स्पष्ट किया है कि चुनाव के बाद सत्ता साझेदारी नहीं होगी। सीट बंटवारे और राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर दोनों दलों के बीच खींचतान बढ़ी है। उधर, अभिनेता से नेता बने विजय की नई राजनीतिक सक्रियता ने राज्य की राजनीति को और पेचीदा बना दिया है।
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) के रिश्तों में भी दरार दिख रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 2026 का विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने का संकेत दिया है। इसके जवाब में कांग्रेस ने भी राज्य की सभी सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है। राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग के बावजूद, राज्य स्तर पर दोनों दलों के बीच तालमेल कमजोर पड़ता दिख रहा है। इन घटनाओं से साफ है कि चुनावी राज्यों में कांग्रेस के सामने बाहरी मुकाबले से ज्यादा आंतरिक एकजुटता बनाए रखना बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।


