Nउत्तराखंड के बहुचर्चित हरिद्वार सराय भूमि खरीद घोटाले में राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए आईएएस अधिकारी और पूर्व नगर आयुक्त वरुण चौधरी की बर्खास्तगी की संस्तुति कर दी है। नगर निगम के लिए कूड़ा डंपिंग यार्ड हेतु खरीदी गई जमीन में कथित अनियमितताओं और करोड़ों रुपये के नुकसान के मामले में यह कार्रवाई की गई है।
सरकार ने तत्कालीन जिलाधिकारी कमेंद्र सिंह के खिलाफ भी मेजर पनिशमेंट की कार्रवाई का फैसला लिया है। वहीं तत्कालीन एसडीएम अजयवीर सिंह के विरुद्ध प्रतिकूल प्रविष्टि दर्ज करने और उनकी तीन वेतनवृद्धियां रोकने के आदेश जारी किए गए हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य सतर्कता समिति की संस्तुति पर इस मामले में 10 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की अनुमति दे दी है। इनमें कई अधिकारी, कर्मचारी और जमीन विक्रेता शामिल हैं।
क्या है पूरा मामला?
हरिद्वार नगर निगम को गार्बेज डंपिंग यार्ड के लिए भूमि खरीदनी थी। आरोप है कि अधिकारियों और अन्य लोगों की मिलीभगत से 2.3070 हेक्टेयर कृषि भूमि, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 15 करोड़ रुपये थी, उसे 54 करोड़ रुपये में खरीद लिया गया। जांच में पाया गया कि भूमि खरीद प्रक्रिया में कई नियमों और मानकों की अनदेखी की गई।
मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री धामी ने 3 जून 2025 को तत्कालीन जिलाधिकारी, नगर आयुक्त, एसडीएम समेत सात अधिकारियों को निलंबित कर दिया था।
जांच में सामने आया कि जमीन मालिकों ने शुरुआत में लगभग 15 करोड़ रुपये की मांग की थी। उस समय भूमि कृषि श्रेणी में थी। बाद में धारा-143 के तहत भूमि का उपयोग कृषि से व्यावसायिक श्रेणी में परिवर्तित कर दिया गया। इसके तुरंत बाद जमीन का मूल्य बढ़कर करीब 54 करोड़ रुपये आंका गया और नगर निगम ने इसी कीमत पर भूमि खरीद ली।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतनी कम अवधि में कृषि भूमि को व्यावसायिक भूमि में बदलकर उसकी कीमत कई गुना बढ़ाने की योजना किस स्तर पर बनाई गई और इसका लाभ किन लोगों को मिला।
वरुण चौधरी भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के 2017 बैच के अधिकारी हैं और उत्तराखंड कैडर में कार्यरत हैं। वह 21 नवंबर 2023 तक हरिद्वार में नगर आयुक्त और नगर मजिस्ट्रेट के पद पर तैनात रहे। जांच में सामने आया कि जिस दिन भूमि का धारा-143 के तहत परिवर्तन हुआ, उसी दिन नगर निगम के साथ खरीद समझौता भी कर लिया गया। इसी असाधारण तेजी ने पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला दिया।
मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाएगी। दोषी पाए गए लोगों में तत्कालीन नगर आयुक्त वरुण चौधरी, सहायक नगर आयुक्त रविंद्र कुमार दयाल, कर अधीक्षक लक्ष्मीकांत भट्ट, सहायक अभियंता एवं प्रभारी अधिशासी अभियंता आनंद सिंह मिश्राण, संपत्ति लिपिक वेदपाल, मानचित्रकार दिनेश कांडपाल तथा भूमि विक्रेता सुमन देवी, जितेंद्र कुमार, अभिषेक यादव और सुजीत कुमार सिंह शामिल हैं।
जानकारी के अनुसार, इसी भूमि को खरीदने का प्रस्ताव पहले भी प्रशासन के सामने आया था। उस समय तत्कालीन जिलाधिकारी और नगर निगम प्रशासक धीरज सिंह गर्ब्याल ने प्रस्ताव को मंजूरी देने से इनकार कर दिया था। बाद में भूमि के उपयोग में बदलाव और मूल्य वृद्धि के बाद इसे खरीद लिया गया, जो अब जांच और कार्रवाई का प्रमुख आधार बना हुआ है।


