उत्तराखंड हाईकोर्ट में बिंदुखत्ता को राजस्व गांव घोषित किए जाने की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद याचिकाकर्ता को बड़ा झटका लगा है। अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए कोई राहत देने से इनकार कर दिया।
यह मामला नैनीताल के चर्चित बिंदुखत्ता वन ग्राम से जुड़ा है, जहां लंबे समय से इसे राजस्व गांव का दर्जा देने की मांग उठती रही है। इस मामले में चोरगलिया निवासी भुवन चंद्र पोखरिया की ओर से जनहित याचिका दायर की गई थी, जिस पर मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ में सुनवाई हुई।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि राज्य सरकार वर्ष 2009 और 2024 में लगभग पांच लाख आबादी वाले बिंदुखत्ता को राजस्व गांव घोषित करने की घोषणा कर चुकी है। इसके अलावा विधानसभा से भी इस संबंध में प्रस्ताव पारित किया जा चुका है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
याचिका में यह भी कहा गया कि हरिद्वार जिले के दो वन ग्रामों को राजस्व गांव का दर्जा दिया जा चुका है, जबकि बिंदुखत्ता के साथ भेदभाव हो रहा है। इससे यहां के 12 गांवों के लाखों लोग अपने अधिकारों से वंचित हैं।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि केंद्र सरकार ने 4 दिसंबर 2006 को नैनीताल, चंपावत और उधमसिंह नगर जिलों में वन भूमि के हस्तांतरण पर रोक लगा रखी है।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ऐसा कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि वन भूमि के हस्तांतरण पर लगा प्रतिबंध हटाया गया है। इसी आधार पर कोर्ट ने याचिका को निस्तारित करते हुए किसी भी प्रकार की राहत देने से इनकार कर दिया।


