भारतीय जनता पार्टी (भा.ज.पा.) के संगठन चुनावों में कई राज्यों में नेताओं के विरोध और सामाजिक व राजनीतिक समीकरणों को लेकर पार्टी को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी संविधान के अनुसार, राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव तभी संभव है जब पचास प्रतिशत यानी आधे राज्यों के चुनाव हो चुके हों। वर्तमान में भाजपा के 38 प्रदेश हैं, जिनमें से लगभग 10 राज्यों में चुनाव पूरे हो चुके हैं।
भा.ज.पा. को कर्नाटक में प्रदेश अध्यक्ष विजयेंद्र को बनाए रखने को लेकर विरोध का सामना करना पड़ रहा है। राज्य के कुछ नेताओं के विरोध के कारण यह मुद्दा पार्टी के लिए चुनौती बन चुका है। तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर नेतृत्व में बदलाव का सवाल उठ रहा है। इन राज्यों में चुनावों को सिर्फ एक साल ही बचा है, जिससे नेतृत्व परिवर्तन पर गंभीर विचार किया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश में प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी ने लोकसभा चुनाव के बाद पद छोड़ने की पेशकश की थी, लेकिन संगठन चुनाव के कारण इस पर निर्णय नहीं लिया जा सका। सूत्रों के अनुसार, होली के बाद ही नए अध्यक्ष के चयन पर फैसला हो सकता है। प्रदेश के सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए नए अध्यक्ष का चयन किया जाएगा।
मध्य प्रदेश में भाजपा नेतृत्व इस समय सामाजिक समीकरणों को लेकर विचार कर रहा है। मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा को पांच वर्ष हो गए हैं, और इस दौरान राजपूत, ब्राह्मण के साथ-साथ दलित और आदिवासी नेताओं के नाम पर भी विचार किया जा रहा है। यह फैसला अन्य राज्यों के अध्यक्षों के सामाजिक समीकरणों को देखकर लिया जाएगा।
तेलंगाना और गुजरात में भी प्रदेश अध्यक्षों के बदलाव की संभावनाएं हैं। दोनों राज्यों में प्रदेश अध्यक्ष वर्तमान में केंद्रीय मंत्री हैं, और इन राज्यों में चुनावों की स्थिति को देखते हुए वहां सामाजिक समीकरणों के हिसाब से बदलाव किया जाएगा। कुछ नेता चाहते हैं कि भाजपा एक व्यक्ति, एक पद के सिद्धांत में लचीलापन अपनाए, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व इसके पक्ष में नहीं है।
इन सभी चुनौतियों और समीकरणों के बीच भाजपा को संगठन चुनावों की प्रक्रिया को ठीक से अंजाम तक पहुंचाने में पसीना बहाना पड़ रहा है, ताकि पार्टी अपने चुनावी उद्देश्यों को प्राप्त कर सके।