हल्द्वानी: आर्य समाज हल्द्वानी में आयोजित साप्ताहिक सत्संग के दौरान प्रसिद्ध वैदिक विद्वान एवं प्राचार्य प्रो. (डॉ.) विनय विद्यालंकार ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए ‘ईश्वर, प्रकृति और परिवार’ के गहरे संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने ऋग्वेद के सातवें मंडल के मंत्रों के माध्यम से जीवन में संतुलन और आध्यात्मिकता का महत्व समझाया।
अपने व्याख्यान में उन्होंने कहा कि वेदों में ईश्वर को ‘वरुण’ और ‘राजन’ के रूप में वर्णित किया गया है। ‘वरुण’ वह शक्ति है जो अदृश्य बाधाओं से हमारी रक्षा करती है। उन्होंने भारतीय नौसेना के ध्येय वाक्य ‘शं नो वरुणः’ का उल्लेख करते हुए बताया कि वेदों का यह दर्शन आज भी प्रासंगिक है।
पारिवारिक जीवन पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि पिता को सूर्य (अग्नि तत्व) और माता को चंद्रमा (सोम तत्व) का प्रतीक माना गया है। परिवार में संतुलन बनाए रखने के लिए दोनों का एक-दूसरे के पूरक होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि परिवार में तनाव या क्रोध बढ़े, तो दूसरे पक्ष को शांत स्वभाव अपनाकर स्थिति को संभालना चाहिए।
उन्होंने महाकवि कालिदास के ‘रघुवंश’ का उदाहरण देते हुए राजा दिलीप के आदर्शों का उल्लेख किया और कहा कि माता-पिता को केवल पालन-पोषण ही नहीं, बल्कि बच्चों में संस्कार और विनम्रता का विकास भी करना चाहिए।
सत्संग के अंत में डॉ. विद्यालंकार ने कहा कि मानव शरीर साध्य नहीं, बल्कि ईश्वर की प्राप्ति का एक साधन है। इसलिए इसका उपयोग परोपकार और आध्यात्मिक उन्नति के लिए करना चाहिए।


