सितारगंज। तहसील क्षेत्र में वर्ष 1997 में किए गए पट्टा आवंटन को लेकर अब सवाल खड़े होने लगे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ पट्टों का आवंटन ऐसे दिनों में किया गया, जब सरकारी कार्यालयों में अवकाश था। इसके अलावा एक पट्टे को आवंटन के कुछ समय बाद निरस्त कर जमीन को सरकार के खाते में दर्ज किए जाने और करीब एक माह बाद उसी जमीन का दोबारा परिवार के सदस्यों के नाम पट्टा आवंटित किए जाने का मामला भी सामने आया है। ग्रामीणों ने पूरे प्रकरण की राजस्व अभिलेखों के आधार पर जांच कराने की मांग की है।
ग्रामीणों के अनुसार 25 सितंबर 1997 और 17 सितंबर 1997, जो विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर अवकाश का दिन बताया जा रहा है, उन तिथियों में पट्टा आवंटन किए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इसी तरह 19 अक्टूबर 1997 को रविवार होने के बावजूद सुरजीत सिंह, जगतार सिंह और हरबंस सिंह के नाम पट्टा आवंटित किए जाने की बात कही जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि संबंधित तिथियों में सरकारी कार्यालय बंद थे तो उस दिन पट्टा आवंटन की प्रक्रिया किस स्तर पर और किस अधिकारी के आदेश से पूरी की गई, इसकी जांच आवश्यक है।
मामले में सबसे गंभीर सवाल उस जमीन को लेकर उठाया जा रहा है, जिसका पहले पट्टा आवंटित किया गया और बाद में उसे निरस्त कर जमीन को सरकार के खाते में दर्ज कर दिया गया। आरोप है कि पट्टा निरस्त होने के करीब एक माह बाद उसी जमीन का दोबारा पट्टा हरबंस सिंह और जगतार सिंह के परिवार से जुड़े लोगों के नाम आवंटित कर दिया गया। इससे ग्रामीणों में यह सवाल उठ रहा है कि जब जमीन एक बार सरकार के खाते में चली गई थी तो दोबारा उसी भूमि का आवंटन किस प्रक्रिया के तहत किया गया।
ग्रामीणों का कहना है कि पट्टा आवंटन से संबंधित मूल पत्रावली, आदेश, खसरा-खतौनी, पट्टा रजिस्टर और निरस्तीकरण के अभिलेखों की जांच की जानी चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि संबंधित तिथियों में अवकाश होने के बावजूद पट्टा आवंटन की कार्रवाई कैसे हुई और बाद में निरस्त की गई जमीन को दोबारा किन परिस्थितियों में आवंटित किया गया।
दस्तावेज में 2 जून 2022 को आठ लाख रुपये की नकद राशि प्राप्त किए जाने का उल्लेख भी दिखाई देता है। ग्रामीणों ने इस लेनदेन और पट्टा संबंधी पूरी पत्रावली की भी जांच कराने की मांग की है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि धनराशि किस मद में और किसके द्वारा दी गई थी।
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच राजस्व विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से कराई जाए। जांच में संबंधित वर्षों के राजस्व रिकॉर्ड, पट्टा आवंटन रजिस्टर और कार्यालयीन आदेशों का मिलान कराया जाए। उनका कहना है कि यदि अभिलेखों में नियमों के विपरीत कार्रवाई पाई जाती है तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित पक्षों की भूमिका भी सामने आनी चाहिए। फिलहाल पूरे मामले में पुराने राजस्व अभिलेखों की जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।


