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जब देवी लौटती हैं मायके… कुमाऊं की वादियों में जागती है आस्था की अमर ज्योति

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उत्तराखंड के कुमाऊं की लोक आस्था का सबसे बड़ा पर्व नंदा-सुनंदा महोत्सव इन दिनों पूरे उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। नैनीताल और अल्मोड़ा में मां नंदा और सुनंदा की भव्य मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा के साथ यह पौराणिक उत्सव शुरू हो गया है। इस अवसर पर मंदिर परिसर भक्ति गीतों, पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से गूंज उठा है।

नंदा देवी मेले की शुरुआत 16वीं शताब्दी में चंद राजवंश के शासक बाज बहादुर चंद ने की थी। यह मेला भाद्रपद पंचमी से गणेश पूजन के साथ शुरू होता है। षष्ठी को कदली वृक्षों को आमंत्रित किया जाता है, और सप्तमी को मंदिर परिसर में लाकर इनसे मूर्ति निर्माण होता है। अष्टमी पर मां के दर्शन होते हैं और फिर एकादशी को मूर्तियों का विसर्जन किया जाता है।

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नैनीताल स्थित नैना देवी मंदिर में भी नंदा-सुनंदा महोत्सव की धूम है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां नंदा-सुनंदा वर्ष में एक बार अष्टमी के दिन अपने मायके यानी कुमाऊं की धरती पर आती हैं। यहां भी तड़के 2 बजे से पूजा शुरू हुई और साढ़े 5 बजे तक चली। इसके बाद मंदिर के कपाट दर्शनार्थियों के लिए खोल दिए गए।

अल्मोड़ा में स्थानीय कलाकारों द्वारा केले के वृक्षों, बांस (रिंगाल) और रुई से मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। कलाकार रवि गोयल और दीपक जोशी जैसे मूर्तिकार पिछले कई दशकों से इस कला को जीवित रखे हुए हैं। मूर्ति निर्माण के बाद रात साढ़े 11 बजे से लेकर तड़के 3 बजे तक विशेष पूजा और प्राण प्रतिष्ठा होती है। इस अनुष्ठान में चंद वंशज और उनके पुरोहित शामिल होते हैं।

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पूरे कुमाऊं में इन दिनों भक्ति का वातावरण है। अल्मोड़ा के नंदा देवी मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन, माता की चौकी और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। भजन गायकों में निर्मल पंत, अनिल सनवाल, संगीता जोशी, ललित प्रकाश, आदि शामिल रहे। मां नंदा महिला समिति द्वारा आयोजित कार्यक्रमों ने पूरे माहौल को भक्तिमय बना दिया।

अष्टमी के दिन मां के मायके आगमन के बाद, 5 सितंबर (एकादशी) को नयना देवी मंदिर से मां नंदा-सुनंदा को विदाई दी जाएगी। नैनी झील में उनकी प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा। यह परंपरा ठीक उसी तरह निभाई जाती है, जैसे कोई पिता अपनी बेटी को ससुराल विदा करता है – पूरे भावनात्मक और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों के साथ।

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देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए नैनीताल और अल्मोड़ा पहुंच रहे हैं। ललिता जोशी, जो पिछले 25 साल से लगातार महोत्सव में शामिल होती हैं, ने बताया कि चाहे वो किसी भी शहर में हों, नंदा अष्टमी पर मां के दर्शन के लिए नैनीताल जरूर आती हैं।

हिल दर्पण डेस्क

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