मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान की दलीलें सुनने के बाद केंद्र को नोटिस जारी किया। मामले में अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी।
डीएनपीए ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका में डीपीडीपी अधिनियम की कई धाराओं और डीपीडीपी नियमावली, 2025 के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। एसोसिएशन का कहना है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से समाचार संकलन, खोजी पत्रकारिता और समाचार स्रोतों की गोपनीयता प्रभावित हो सकती है।
‘अनुमति लेनी पड़ी तो न्यूजरूम बंद हो जाएंगे’
सुनवाई के दौरान माधवी दीवान ने दलील दी कि यदि पत्रकारों को किसी व्यक्ति से संबंधित खबर प्रसारित करने से पहले उसकी सहमति लेनी पड़े, तो स्वतंत्र पत्रकारिता करना मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने आशंका जताई कि इससे समाचार संस्थानों के कामकाज पर गंभीर असर पड़ेगा और यह पूर्व-सेंसरशिप जैसी स्थिति पैदा कर सकता है।
दीवान ने कहा कि समाचारों की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए पत्रकारिता के लिए अलग व्यवस्था जरूरी है। उनके अनुसार, खबरों की रिपोर्टिंग कई बार तत्काल करनी होती है और हर स्थिति में संबंधित व्यक्ति की पूर्व अनुमति लेना व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया संस्थान पहले से ही केबल टेलीविजन कानून, आईटी नियमों, प्रसारण संबंधी प्रावधानों और प्रेस परिषद के नियमन के दायरे में आते हैं।
हालांकि, पीठ ने विवादित नियमों पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार करते हुए कहा कि दूसरे पक्ष को सुने बिना एकतरफा आदेश नहीं दिया जा सकता।
नागरिकों के अधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता में संतुलन जरूरी
सुनवाई के दौरान पीठ ने मौखिक टिप्पणी की कि यह मामला नागरिकों के अधिकारों और मीडिया के अधिकारों के बीच संतुलन से जुड़ा है। अदालत ने कहा कि इस क्षेत्र की विशेषज्ञ होने के नाते डीएनपीए यह सुझाव देने के लिए उपयुक्त है कि डेटा संरक्षण के अधिकारों के दुरुपयोग को रोकते हुए पत्रकारिता की स्वतंत्रता कैसे सुनिश्चित की जा सकती है।
एसोसिएशन ने दावा किया कि डेटा संरक्षण कानून के पहले के प्रस्तावित संस्करणों में पत्रकारिता के उद्देश्यों के लिए स्पष्ट छूट का प्रावधान था, लेकिन मौजूदा कानून में ऐसी छूट नहीं होने से गंभीर व्यावहारिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
आरटीआई कानून में संशोधन को भी दी चुनौती
याचिका में डीपीडीपी अधिनियम की धारा 7, 17(2), 18, 19, 27, 29, 36, 37 और 44(3) के साथ-साथ डीपीडीपी नियमावली, 2025 के नियम 16, 17 और 23 को भी चुनौती दी गई है।
इसके अलावा, डीएनपीए ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम की धारा 8(1)(j) में किए गए संशोधन पर भी सवाल उठाए हैं। एसोसिएशन का तर्क है कि इससे सार्वजनिक अधिकारियों से संबंधित सूचनाओं तक पहुंच सीमित हो सकती है और सार्वजनिक जवाबदेही तथा निगरानी प्रभावित हो सकती है। इस मामले में अदालत अब केंद्र सरकार का पक्ष सुनने के बाद आगे विचार करेगी।



